अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारियों और सचिवों के 86वें सम्मेलन के दूसरे दिन विधायिका की जवाबदेही पर मंथन हुआ। विधानसभा मंडप में आयोजित सम्मेलन में विभिन्न राज्यों से आए विधानसभा अध्यक्षों ने विधायकों के लिए एक सिलबेस तैयार किए जाने की आवश्यकता को रेखांकित किया। विधायिका को लोकतंत्र की आत्मा बताया।
गुजरात के विधानसभा अध्यक्ष शंकर चौधरी ने कहा कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए शिक्षित, प्रशिक्षित और सक्षम जनप्रतिनिधियों का होना अत्यंत आवश्यक है। आज विधायक की भूमिका केवल सदन तक सीमित नहीं रह गई है। उन्हें कानून निर्माण, बजट पर विचार, क्षेत्रीय विकास, जनसंपर्क, प्रशासनिक समन्वय और पार्टी संवाद जैसे अनेक दायित्व निभाने होते हैं। ऐसे में उनके लिए प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण एक अनिवार्य आवश्यकता बन गई है। इसके लिए एक सिलबेस तैयार किया जाना चाहिए।
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चौधरी ने कहा कि गुजरात विधानसभा में हमने विधायकों के लिए विधायी ड्राफ्टिंग, बजट प्रक्रिया, साइबर सुरक्षा और डिजिटल कार्यप्रणाली पर विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रारंभ किए। बजट में उनके अच्छे सुझावों पर अमल सुनिश्चित किया। इससे सदन के कार्य की गुणवत्ता और प्रभाव में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला है। विधायकों के स्वास्थ्य परीक्षण, योग और ध्यान जैसे प्रयोग भी किए गए, जिनके सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं।
आपसी सहयोग और सौहार्द बढ़ाने के लिए विधायक क्रिकेट लीग और सामूहिक आयोजनों जैसे प्रयास किए गए, जिससे विधायकों, मंत्रियों और अधिकारियों के बीच समन्वय मजबूत हुआ। डिजिटल नवाचार के तहत पेपरलेस विधानसभा, ऑनलाइन प्रश्नोत्तर और डाटा आधारित बजट तैयारी ने कार्यप्रणाली को अधिक पारदर्शी और जनोन्मुख बनाया है। 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सशक्त, प्रशिक्षित और मूल्यनिष्ठ जनप्रतिनिधि अत्यंत आवश्यक हैं। सशक्त विधायक ही सशक्त लोकतंत्र की नींव हैं।
