यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासनिक गलियों में आज तीन किस्से काफी चर्चा में रहे। चाहे-अनचाहे आखिर ये बाहर आ ही जाते हैं। इन्हें रोकने की हर कोशिश नाकाम होती है। आज की कड़ी में ‘क्यों याद आई अष्टावक्र की कहानी’ की कहानी। इसके अलावा ‘बिल्डर से दोस्ती, जांच में क्लीन चिट’ और ‘कमिश्नर बहादुर की वसूली’ के किस्से भी चर्चा में रहे। आगे पढ़ें, नई कानाफूसी… 

क्यों याद आई अष्टावक्र की कहानी

पिछले दिनों भगवा दल के प्रशिक्षण कार्यक्रम में एक माननीय के अष्टावक्र और राजा जनक के दरबार की कहानी सुनाने की खूब चर्चा है। दरअसल, वह माननीय बनने के बावजूद संगठन में भी पदासीन हैं। अब चूंकि संगठन के नए मुखिया ने कमान संभाल ली है और संगठन में बदलाव की भी चर्चा है। इसलिए कहा जा रहा है कि माननीय को संगठन वाला पद छिनने पर सूबे में हनक कमजोर होने का डर सता रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि इस कहानी के जरिये माननीय आखिर क्या बताना चाह रहे थे?

बिल्डर से दोस्ती, जांच में क्लीन चिट

एक आईएएस अधिकारी एक बिल्डर से दोस्ती के लिए मशहूर थे। लिहाजा एक केंद्रीय एजेंसी की नजरों में आ गए। बिल्डर के साथ उनकी भी सारी चल-अचल संपत्तियों को खंगाला गया तो रोचक मामला सामने आया। आईएएस महोदय की पत्नी भी अधिकारी हैं और अक्सर विदेश जाती रहती हैं। उनकी यात्रा के टिकट बिल्डर महोदय करवा रहे थे। एजेंसी ने शिकंजा सका तो साहब जवाब नहीं दे सके। बाद में बिल्डर से ही खुद को बचाने को कहा। बिल्डर ने भी खूब दोस्ती निभाई और सारा दोष खुद पर ले लिया। सुना है कि साहब ने किस्तों में टिकट के पैसे लौटाने शुरू कर दिए हैं।

कमिश्नर बहादुर की वसूली

कमिश्नर बहादुर के क्या कहने। अभी तक तो सरकारी योजनाओं और खनन से ही वसूली करते थे। अब वसूली का सिलसिला व्यापारियों तक पहुंच चुका है। उनके क्षेत्र के हर मेडिकल स्टोर से महोत्सव के नाम पर दो-दो हजार रुपये वसूले गए। इस तरह से कई करोड़ रुपये इकट्ठा हुए। इतना पैसा कहां खर्च हुआ, आप भी सोचिए! हमें पता चलेगा तो ब्योरे के साथ बताएंगे। हालांकि, पता चला है कि कमिश्नर बहादुर ने अपनी पत्नी के नाम नोएडा में आलीशान फ्लैट खरीदा है जो किसी बंगले से कम नहीं है।



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