जूनियर क्लर्क भर्ती परीक्षा में फर्जी दिव्यांग प्रमाणपत्र के जरिये सेंधमारी के खुलासे के बाद जिला अस्पताल के आउटसोर्स कर्मियों और दिव्यांगता प्रमाणन बोर्ड की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। एसटीएफ की जांच में जिला अस्पताल से जुड़े तीन आउटसोर्स कर्मी रडार पर आ गए हैं। शुक्रवार को अवकाश होने के बावजूद स्वास्थ्य महकमे में दिनभर खलबली मची रही।
सूत्रों के अनुसार, जिला अस्पताल में वार्ड बॉय शिवा यादव उर्फ मोंटी यादव की भूमिका संदिग्ध पाई गई है। वह करीब 40 हजार रुपये में फर्जी दिव्यांग प्रमाणपत्र बनवाने का नेटवर्क चला रहा था। इस काम में उसके दो अन्य आउटसोर्स सहयोगी भी सक्रिय बताए जा रहे हैं। एसटीएफ द्वारा पकड़े गए सरगना मनीष मिश्रा, आकाश अग्रवाल, सौरभ सोनी सहित अन्य से पूछताछ में सामने आया कि कई अभ्यर्थियों ने फर्जी दिव्यांग प्रमाणपत्र के जरिये परीक्षा में हिस्सा लिया। राजकिशोर, राम मिलन और अभिषेक यादव के नाम इनमें सामने आए हैं, जिनके प्रमाणपत्र झांसी और ललितपुर से बनाए गए थे। अस्पताल कर्मियों के अनुसार, शिवा यादव और उसके दो सहयोगी लंबे समय से इस काम में लगे थे। तीनों वार्ड बॉय के पद पर तैनात होने के बावजूद उन्हें शायद ही कभी अपने मूल कार्य करते देखा गया। यह भी चर्चा है कि उनके रहन-सहन और गतिविधियों से स्पष्ट था कि वे किसी बड़े नेटवर्क से जुड़े हैं, लेकिन किसी अधिकारी ने इस पर ध्यान नहीं दिया।
