विकासनगर की उस बस्ती में धुआं थम चुका है, लेकिन दर्द अब भी सुलग रहा है। बुधवार की आग ने सिर्फ झोपड़ियां नहीं जलाईं। इसने लोगों की पूरी जिंदगी, उनकी मेहनत, रिश्ते और सपनों को राख में बदल दिया। बृहस्पतिवार को यहां का मंजर और भी ज्यादा मार्मिक था। राख के ढेर में झुके लोग अपने हिस्से की जिंदगी तलाश रहे थे। कोई बेटे-बेटी की अधजली किताबें समेट रहा था तो कोई घर-गृहस्थी के बचे-खुचे निशान खोज रहा था।
इस बस्ती में रहने वाले ज्यादातर परिवार मजदूरी कर जीवन यापन करते हैं। वर्षों की मेहनत से जोड़ा गया गृहस्थी का सामान चंद मिनटों में राख हो गया। किसी की बाइक जलकर राख हो गई, तो किसी के मवेशी असमय काल के गाल में समा गए। आग ने सिर्फ सामान नहीं, पहचान भी छीन ली।
करीब 95 प्रतिशत लोगों के आधार कार्ड, बैंक पासबुक, ड्राइविंग लाइसेंस, बाइक-स्कूटी के कागजात और जरूरी दस्तावेज जलकर खत्म हो गए। पीड़ितों ने बताया कि आग इतनी भयावह थी कि तन पर पहने कपड़े के अलावा वह घर से कुछ भी सामान बाहर नहीं निकाल सके।