राजधानी लखनऊ स्थित केजीएमयू के मनोरोग विभाग में अनूठी थेरेपी की शुरुआत हुई है। मनोरोग से जूझ रहे बच्चों व किशोरों को भारी-भरकम दवाओं और साइड इफेक्ट से बचाने के लिए भारतीय सैंड ट्रे थेरेपी (बालू भरे ट्रे से उपचार) का इस्तेमाल किया जा रहा है। इस अनूठी थेरेपी से बच्चे खेल-खेल में मानसिक उलझनों से बाहर आ रहे हैं। इसके साथ ही उनकी रचनात्मकता भी निखर रही है।

बाल मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. अमित आर्या बताते हैं कि थेरेपी की सबसे बड़ी खासियत इसका भारतीयकरण है। कुछ अस्पतालों में यूरोपियन सैंड ट्रे थेरेपी का सहारा लिया जाता है। इसमें यूरोपियन संस्कृति से जुड़े खिलौने होते हैं। इसका भारतीय बच्चों पर उतना असर नहीं होता। केजीएमयू में सैंड ट्रे थेरेपी में इस्तेमाल किए जाने वाले खिलौने पूरी तरह से देसी हैं। इनमें आदिवासी समुदाय से लेकर विभिन्न राज्यों, क्षेत्रों और वहां की संस्कृतियों पर आधारित खिलौने व आकृतियां रखी गई हैं।

मोबाइल फोन की लत छुड़ाना भी आसान है

डॉ. अमित ने कहा कि भारतीय संस्कृति से जुड़े खिलौने बच्चों को अपनी जड़ों से जोड़कर सुरक्षित माहौल का अहसास कराते हैं। इससे मोबाइल फोन की लत छुड़ाना भी आसान है। हर सप्ताह इस थेरेपी के 12 से 20 सेशन होते हैं। मनोचिकित्सा विभागाध्यक्ष डॉ. विवेक अग्रवाल, सेंसरी इंटिग्रेशन थेरेपिस्ट अजय और थेरेपिस्ट श्रीतोष की देखरेख में बच्चों और किशोरों का सफलतापूर्वक इलाज किया जा रहा है।

क्या है सैंड ट्रे थेरेपी?

मनोरोग विभाग में तैयार की गई विशेष सैंड ट्रे (रेत से भरी ट्रे) में बच्चे कल्पनाओं और मन की दुनिया को आकार देते हैं। ऑटिज्म या अन्य मनोरोग से पीड़ित बच्चे जो अपनी बात खुलकर नहीं कह पाते, वे इस रेत पर खिलौनों से भावनाओं को उजागर कर देते हैं। बच्चे इन सांस्कृतिक प्रतीकों और खिलौनों को रेत पर सजाकर अनजाने में अपने अवचेतन मन की बात चिकित्सकों के सामने रख देते हैं।

इस थेरेपी के फायदे


  • बच्चों को छोटी उम्र में ही नींद, तनाव की दवाएं देने से बचा जा सकता है।

  • खेल-खेल में बच्चों की सोच और एकाग्रता बेहतर होती है।

  • बिना किसी दर्द या दबाव के बच्चे मानसिक विकारों से बाहर आ सकते हैं।

  • प्राकृतिक रूप से चिड़चिड़ापन, तनाव कम होता है। रचनात्मकता बढ़ती है।



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