इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक अहम फैसले में कहा कि आपराधिक मामले में किसी आरोपी की गैरमौजूदगी में दर्ज किए गए सबूत, जिन पर उसे तलब किया जाता है, बाद में उसकी सजा का आधार नहीं बन सकते। न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की खंडपीठ ने हरदोई जिले के बेनीगंज थानाक्षेत्र में वर्ष 2008 के हत्या मामले के एक आरोपी को बरी करते हुए यह टिप्पणी की।
ट्रायल कोर्ट ने अपीलकर्ता प्रमोद कुमार सिंह उर्फ गुड्डू सिंह को हत्या, हत्या के प्रयास आदि में दोषी ठहराया था। उसे अभियोजन पक्ष की गवाही पर आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी, जो उसे ट्रायल का सामना करने के लिए तलब करने से पहले दर्ज की गई थीं। यह मामला विजय कुमार सिंह की हत्या से जुड़ा है, जिनकी कथित तौर पर चार आरोपियों द्वारा चलाई गईं गोलियों से हुई थी।
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आरोपपत्र में अपीलकर्ता प्रमोद का नाम शामिल नहीं था, क्योंकि पुलिस घटना में उसकी संलिप्तता साबित नहीं कर पाई। चार्जशीट में नामजद चार आरोपियों के ट्रायल के दौरान अपीलकर्ता को ट्रायल का सामना करने के लिए तलब करने के लिए अर्जी दाखिल की गई, जिसे जून 2012 में मंजूर किया गया। ट्रायल कोर्ट ने मृतक के चाचा और एक स्वतंत्र गवाह के पिछले (समन जारी होने से पहले के) बयानों पर भरोसा करते हुए अपीलकर्ता को दोषी ठहरा दिया। इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने मृतक के चाचा के उस बयान पर भरोसा करके गंभीर गलती की थी जिसमें उन्होंने अपीलकर्ता पर आरोप लगाया। क्योंकि यह बयान तब रिकॉर्ड किया गया, जब अपीलकर्ता को एक अतिरिक्त आरोपी के तौर पर समन जारी नहीं किया गया।
खंडपीठ ने यह पाया कि इस बयान को अपीलकर्ता के खिलाफ इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। इसके मद्देनजर और यह देखते हुए कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई अन्य सबूत मौजूद नहीं था, जिससे अपीलकर्ता की कथित अपराध में संलिप्तता साबित हो सके, खंडपीठ ने उसकी अपील स्वीकार कर ली और उसे दोषी ठहराने के फैसले को रद्द कर दिया।
