उत्तर प्रदेश में रासायनिक खाद की खपत कम करने के लिए नई रणनीति बनाई गई है। अलग-अलग योजनाओं के तहत गोबर की खाद से जैविक व वर्मी कंपोस्ट खाद तैयार की जाएगी। इसके लिए ग्रामीणों को वैज्ञानिक तरीके भी सिखाए जाएंगे। खाद की बिक्री से किसानों की आय बढ़ेगी। प्रदेश में अंधाधुंध रासायनिक खाद के प्रयोग से मिट्टी की सेहत खराब हो रही है। 

पिछले वर्ष मिट्टी जांच अभियान में पता चला कि करीब 25 जिलों में यूरिया व अन्य रासायनिक खाद जरूरत से ज्यादा प्रयोग की गई। इससे मिट्टी की उर्वरता प्रभावित हुई है। ऐसे में अब गो आधारित प्राकृतिक खेती व जैविक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। पशुपालन और कृषि विभाग गोबर की खाद से जैविक व वर्मी कंपोस्ट तैयार करने के लिए प्रशिक्षण देंगे। इतना ही नहीं, गो आश्रय स्थलों पर वर्मी कंपोस्ट तैयार करके उसकी बिक्री भी शुरू कराई गई है।

गो आधारित प्राकृतिक खेती अभियान

प्रदेश में गो आधारित प्राकृतिक खेती के लिए 80 लाख मीट्रिक टन गोबर खाद तैयार करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए 2.35 लाख किसानों का चयन किया गया है। 1,886 समूह बनाए जा रहे हैं। हर समूह में 125 किसान हैं। प्राकृतिक खेती यानी गोबर खाद व वर्मी कंपपोस्ट से मिट्टी की जैविक कार्बन, उर्वरता और जलधारण करने की क्षमता बढ़ेगी। सूक्ष्म जीवाणुओं में वृद्धि होगी। किसानों को गोबर-गोमूत्र से जीवामृत, घनजीवामृत व वर्मी कंपोस्ट तैयार करना भी सिखाया जाएगा। करीब एक टन गोबर से ढाई से तीन सौ किलो जैविक व वर्मी कंपोस्ट खाद तैयार की जाएगी।

गो आश्रय स्थलों पर तैयार होगी खाद

प्रदेश के गो आश्रय स्थलों से भी जैविक खाद तैयार करने की रणनीति बनाई गई है। वर्तमान में गो आश्रय स्थलों में करीब 9.5 लाख गोवंश हैं, जिनसे करीब 3800 टन गोबर निकलता है। इससे इस वर्ष 53.72 लाख क्विंटल खाद तैयार की गई। इसे बेच कर चारा खरीदा गया। गो आश्रय स्थल में 489 वर्मी कंपोस्ट यूनिट तैयार की गई हैं, जिनमें से 194 को इस वर्ष चालू किया जाएगा। प्रदेश मैं जैविक खाद उत्पादन करीब 50 फीसदी बढ़ाने की रणनीति तैयार की गई है।

प्रदेश में रासायनिक खाद की स्थिति 

कृषि विभाग के मुताबिक, खरीफ-2026 में यूरिया 13.42 लाख मीट्रिक, डीएपी 5.17 लाख मीट्रिक टन, एमओपी 28.13 लाख मीट्रिक टन उपलब्ध है। इसी तरह सहकारिता विभाग में 5.21 लाख मीट्रिक टन यूरिया और 2.84 लाख मीट्रिक टन डीएपी उपलब्ध है।



पशुधन एवं दग्ध विकास मंत्री धर्मपाल सिंह ने कहा कि गो पालकों की आय बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। गाय के गोबर, मूत्र से जैविक, वर्मी कंपोस्ट, जीवामृत आदि तैयार करने के लिए किसानों को प्रशिक्षण दिया जाएगा। इससे मिट्टी की उर्वरता भी बचाई जा सकेगी और किसानों की आय भी बढ़ेगी।



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