यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासनिक गलियों में आज तीन किस्से काफी चर्चा में रहे। चाहे-अनचाहे आखिर ये बाहर आ ही जाते हैं। इन्हें रोकने की हर कोशिश नाकाम होती है। आज की कड़ी में ‘चंदा चोरी के बीच चंदा वसूली’ की कहानी। इसके अलावा ‘कुर्सी बचाएं या निष्ठा’ और ‘तबादले में भी जातीय समीकरण’ के किस्से भी चर्चा में रहे। आगे पढ़ें, नई कानाफूसी…
चंदा चोरी के बीच चंदा वसूली
चंदा चोरी के बीच चंदा वसूली की खबर आई है। साफ-सुथरी आबोहवा के लिए काम करने वाले महकमे में पदोन्नति के लिए इन दिनों चंदा इकट्ठा हो रहा है। दर है प्रति कर्मचारी 25 हजार रुपये। भेदिये बता रहे हैं कि करीब 200 कर्मचारियों को चंदा देने का संदेश भेज दिया गया है। कलेक्शन शुरू हो गया है। साथ ही संदेश दिया है कि चंदा नहीं दिया तो अभिलेख में कमियां तो ढेर हैं।
कुर्सी बचाएं या निष्ठा
चुनावी चर्चाओं के आधार पर कई साहब असमंजस में हैं। वह अभी से सियासी नफा-नुकसान का आकलन करके समीकरण बनाने में जुट गए हैं। ऐसे ही एक साहब हैं जो कुर्सी और निष्ठा के बीच फंस गए हैं। इस सरकार में उन्हें एक महत्वपूर्ण महकमे की विशेष कुर्सी सौंपी गई है लेकिन उन्हें 2027 की चिंता सता रही है। इसलिए वह इस गुणा-भाग में हैं कि आखिर अपनी मौजूदा कुर्सी बचाएं या निष्ठा। दरअसल साहब पुरानी सरकार में भी ताकतवर थे। इसलिए वह अपनी निष्ठा की भी सुरक्षा करना चाहते हैं।
तबादले में भी जातीय समीकरण
चुनाव नजदीक है। लिहाजा राजनीतिक दल ही समीकरण नहीं साध रहे हैं, बल्कि सरकारी महकमों में हो रहे तबादलों में भी यह समीकरण साधा जा रहा है। ऐसे ही एक केंद्रीय जांच एजेंसी में हुए तबादले की चर्चा खूब हो रही है। चर्चा है कि चुन-चुनकर एक जाति विशेष के अधिकारियों को हटा दिया गया। एक दूसरी एजेंसी में तैनात उसी जाति के अफसर को भी दूर भेज दिया गया। एक ही विभाग की दो एजेंसियों में हुए इन तबादलों को लेकर सवाल उठने लगे हैं। उनको हटाने के पीछे की वजह भी चुनाव ही बताई जा रही है, मानो वह हार-जीत का फैसला करा सकते हों।
