गोमती के दोनों किनारों पर चल रहे कंक्रीटीकरण और निर्माण कार्यों पर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने सख्त रुख अपनाया है। उसने गंगा संरक्षण नियमों का हवाला देते हुए गोमती के किनारों, नदी तल और सक्रिय बाढ़ क्षेत्र में नियमों के विपरीत किसी भी निर्माण पर रोक लगा दी है। इससे करीब 2500 करोड़ रुपये की परियोजनाओं पर असर पड़ेगा।

पर्यावरण कार्यकर्ता एडवोकेट आलोक सिंह की याचिका पर सुनवाई करते हुए एनजीटी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव और विशेषज्ञ सदस्य डॉ. अफरोज अहमद की पीठ ने नौ जुलाई को यह अंतरिम आदेश पारित किया। इसके साथ ही एलडीए समेत सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब मांगा है। अगली सुनवाई 25 अगस्त को होगी।

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याचिका में गोमती के किनारे और सक्रिय बाढ़ क्षेत्र में तटबंध, चार लेन सड़क, बहुमंजिला इमारतों समेत विभिन्न निर्माण कार्यों को चुनौती दी गई है। आलोक सिंह ने बताया कि पिपराघाट पुल से शहीद पथ तक गोमती के एक किनारे पर तटबंध बनाया जा रहा है, जबकि शहीद पथ से किसान पथ तक नदी के दोनों किनारों पर तटबंध का काम चल रहा है। 

पर्यावरणीय मानकों के अनुसार नदी के किनारे से 400 मीटर तक ऐसे निर्माण नहीं होने चाहिए। कई स्थानों पर नदी के किनारे से महज छह से 20 मीटर की दूरी पर तटबंध बनाया जा रहा है। याचिका में कहा गया कि एलडीए, सिंचाई व जल संसाधन विभाग और अन्य संबंधित विभागों के अधिकारियों की मिलीभगत से निर्माण कराए जा रहे हैं। इससे पहले से प्रदूषण की मार झेल रही गोमती को स्थायी नुकसान पहुंचने का खतरा बढ़ गया है। अधिकरण ने प्रथमदृष्टया मामले को गंभीर माना है।

गोमती पर भी लागू हैं गंगा संरक्षण के नियम

गंगा नदी (संरक्षण, सुरक्षा एवं प्रबंधन) प्राधिकरण आदेश, 2016 के अनुसार गंगा सिर्फ मुख्य धारा का नाम नहीं है। इसमें उत्तराखंड की प्रमुख नदियों से लेकर प्रयागराज, गंगासागर तक की पूरी गंगा धारा और उसकी सभी सहायक नदियां शामिल हैं। गोमती भी गंगा नदी तंत्र का हिस्सा है। इस कारण गोमती के संरक्षण और उसके बाढ़ क्षेत्र में होने वाले निर्माण पर भी इसी आदेश के प्रावधान लागू होते हैं। इन क्षेत्रों में स्थायी या अस्थायी निर्माण की अनुमति नहीं है।



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