झांसी। एआई के बढ़ते दौर में भी किताबों की उपयोगिता कम नहीं हुई है। बुंदेलखंड विश्वविद्यालय में स्वर्ण पदक सहित अन्य पदक प्राप्त करने वाले मेधावियों ने तकनीक का इस्तेमाल करने के साथ ही किताबों से पढ़ाई कर अव्वल स्थान हासिल किया। मेधावियों का कहना है कि डिजिटल युग में भी किताबों की प्रासंगिकता जरूरी है।
स्वर्ण विजेता आकांक्षा ने लाइब्रेरी में खूब की पढ़ाई
कुलाधिपति स्वर्ण पदक विजेता आकांक्षा रावत ने ललितपुर के नेहरू महाविद्यालय से उद्यान विभाग में परास्नातक किया है। उन्होंने अपनी सफलता का श्रेय अपने गुरुजनों और माता-पिता को दिया। पढ़ाई के अलावा उनकी संगीत, नृत्य आदि में भी उतनी ही रुचि रही है। उन्होंने बताया कि इंटरमीडियएट के दौरान और उसके बाद भी उन्होंने विद्यालय स्तरीय समेत कई प्रतियोगिताओं में भी प्रतिभाग किया है। उन्होंने डिजिटल युग में भी सीखने के लिए किताबों को ही प्रासंगिक बताया। उन्होंने बताया कि उनका अधिकतर समय लाइब्रेरी में ही बीता। उन्होंने कहा कि ऑनलाइन ज्ञान के साथ-साथ किताबों की अहमियत भी उतनी ही है। अपने कॅरिअर के बारे में बताते हुए वह कहती हैं कि वह पीएचडी कर प्रोफेसर बनना चाहती हैं। उनका रुझान और शोध और अकादमिक के क्षेत्र में ही है।
एआई से मदद लें, पर किताबें न छोड़ें : कल्पना
कुलाधिपति रजत पदक विजेता कल्पना शर्मा ने बुंदेलखंड विश्वविद्यालय परिसर से जूलॉजी में परास्नातक किया है। उन्होंने बीएड भी किया है और इसके बाद सीटीईटी की परीक्षा भी उत्तीर्ण की है। उन्होंने बताया कि जब वह अंतिम सेमेस्टर में थीं, तब उनका चयन नीट की कोचिंग कराने वाले संस्थान में हो गया था। वह जालौन के कोंच कस्बे की रहने वाली हैं। उनके पिता मेडिकल कॉलेज संचालक हैं और माता गृहिणी हैं। उनके दादा प्रवक्ता रहे हैं और उनकी पढ़ाई-लिखाई में सहयोग भी खूब दिया। उन्होंने आगे बताया कि न सिर्फ पढ़ाई में बल्कि अन्य गैर शैक्षणिक गतिविधियां जैसे पॉडकास्ट और एंकरिंग आदि में भी उन्होंने खूब प्रतिभाग किया। इसके अलावा कई समाजसेवी संस्थानों से भी जुड़ी रहीं। उन्होंने कहा कि पढ़ाई में एआई की मदद लेना अच्छा है, लेकिन किताबों को कभी न छोड़ें। किताबों के माध्यम से व्यवस्थित जानकारी मिलती है। उन्होंने नए विद्यार्थियों को सीख दी की पढ़ाई के साथ अन्य गतिविधियों में भी हिस्सा लेने से ज्ञान में वृद्धि होती है।
घर के काम भी सीखें : दीक्षा
तीसरे स्थान पर रहने वाली दीक्षा ने झांसी के चिरगांव के चंदन सिंह महाविद्यालय से इतिहास में परास्नातक किया है। उनका कहना कि पढ़ाई तक ही सीमित न रहें, अपने शौक के साथ-साथ घर के काम में भी समय दें। वह चिरगांव में पास एक गांव में रहती हैं। उनके पिता खेती-बाड़ी करते हैं और मां गृहिणी हैं। उन्होंने ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों का बेहतर प्रयोग करने को सही बताया।
कक्षाओं में नियमित जाएं : रूपा
कुलाधिपति रजत पदक विजेता रूपा यादव ने बुंदेलखंड विश्वविद्यालय परिसर से एप्लाइड इकनॉमिक्स में परास्नातक किया है। वह हमीरपुर की रहने वाली हैं। सर्वाधिक सीजीपीए के आधार पर उन्हें यह पुरस्कार दिया गया है। वह रक्षा क्षेत्र में ही अपना कॅरिअर बनाना चाहती हैं। परास्नातक की पढ़ाई के बारे में चर्चा करते हुए वह कहती हैं कि उन्होंने जितना हो सके नियमित कक्षाएं लेने का प्रयास किया है। पढ़ाई के दौरान वह नियमित रूप से अपने प्रोफेसर से संपर्क में रहती थीं। उन्होंने अपनी सफलता का श्रेय अपनी मां को दिया है।
संवाद कौशल बहुत जरूरी : छवि
जालौन की कोंच निवासी कुलाधिपति रजत विजेता छवि द्विवेदी ने बुंदेलखंड विश्वविद्यालय परिसर से बिजनेस इकनॉमिक्स में एमबीए किया है। उन्होंने कहा कि अगर आप के पास अच्छा संवाद कौशल और जरूरी स्किल्स नहीं हैं तो आपको डिग्रियों से ज्यादा मदद नहीं मिलेगी। उन्होंने कहा कि आज के समय में तकनीकी और गैर-तकनीकी दोनों क्षेत्रों में संवाद कौशल के साथ एमएस एक्सल और पावर बीआई जैसी चीजें आना बहुत जरूरी है। इनके लिए तमाम ऑनलाइन प्लेटफॉर्म मौजूद हैं। हालांकि, उन्होंने कहा कि एआई इन्सान की जगह नहीं ले सकता, क्योंकि उसमें मानवीय संवेदनाएं नहीं हैं।
