किसानों को गांव और आसपास ही उपज बेचने की सुविधा देने, बिचौलियों पर निर्भरता कम करने और ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि कारोबार को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बुंदेलखंड पैकेज के तहत झांसी में बनाई गईं ग्रामीण मंडियां ( ग्रामीण अवस्थापना केंद्र) अपने मकसद से भटक गई हैं। करोड़ों रुपये खर्च कर भवन, दुकान, गोदाम समेत अन्य सुविधाएं विकसित की गईं, लेकिन डेढ़ दशक बाद भी ज्यादातर मंडियों में कारोबार शुरू नहीं हो सका। नतीजा यह है कि किसान आज भी अपनी उपज बेचने के लिए दूर-दराज की मंडियों तक जाना पड़ रहा है। कई किसान अपनी उपज बेचने के लिए बिचौलियों पर निर्भर हैं।
बुंदेलखंड विशेष पैकेज की घोषणा नवंबर, 2009 में हुई थी। केंद्र सरकार ने तीन वर्ष के लिए 7,266 करोड़ रुपये का पैकेज मंजूर किया था। इसमें उत्तर प्रदेश के सात और मध्य प्रदेश के छह जिले शामिल थे। उत्तर प्रदेश के हिस्से में 3,506 करोड़ रुपये निर्धारित किए गए थे। पैकेज के तहत सिंचाई, जल संरक्षण और कृषि विकास के साथ कृषि उपज के विपणन के लिए बुनियादी ढांचा विकसित करने पर भी जोर दिया गया था। वर्ष 2019 तक बुंदेलखंड के उत्तर प्रदेश के सात जिलों में 625.33 करोड़ रुपये खर्च कर 138 मंडियां बनाई गईं। इनमें छह जिला स्तरीय मंडियां और 132 तहसील व ब्लॉक स्तर के ग्रामीण अवस्थापना केंद्र शामिल थे। बांदा में 20, महोबा में 11, चित्रकूट में 16, हमीरपुर में 24, जालौन में 20, ललितपुर में 24 और झांसी में 25 ग्रामीण मंडियां/ग्रामीण अवस्थापना केंद्र बनाए गए थे।
भोजला मंडी को छोड़कर ज्यादातर केंद्रों पर सन्नाटा
झांसी में बुंदेलखंड पैकेज के तहत बनाई गई ग्रामीण मंडियों में भोजला मंडी ही प्रमुख रूप से संचालित है। यहां नियमित खरीद होती है। वहीं, झांसी से करीब 11 किलोमीटर दूर गढ़मऊ में बनी मंडी में वर्षों से कारोबार नहीं हुआ है। यहां किसानों और व्यापारियों की सुविधा के लिए विभिन्न व्यवस्थाएं की गई थीं। ओपन जिम और धर्मकांटा जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध कराई गई थीं, लेकिन कारोबार न होने से पूरा परिसर वीरान पड़ा है।
देखरेख के अभाव में मंडी परिसर में जगह-जगह झाड़ियां उग आई हैं और यहां पशु विचरण करते रहते हैं। मंडी के भवन और अन्य संसाधन उपयोग के इंतजार में हैं। बुंदेलखंड पैकेज से बनाई गई अन्य ग्रामीण मंडियों की स्थिति भी इससे अलग नहीं है।
30 फर्मों को जारी हुआ था नोटिस
मंडी के लिए दुकानें और स्थान आवंटित करने के बाद भी जब कारोबार शुरू नहीं हुआ तो प्रशासन ने सख्ती दिखाई। वर्ष 2021 में 30 फर्मों को नोटिस जारी किए गए, जिन्होंने आवंटन के बावजूद अपना काम शुरू नहीं किया था। इनमें अंबाबाय, गढ़मऊ, बछौनी, पुनावली, दिगारा और मानपुर जैसे केंद्रों के आवंटी शामिल थे।
यह बोले –किसान
मंडी तो इसीलिए बनी थी कि इससे किसानों को सुविधा होगी। बनने के बाद सिर्फ एक साल ही गढ़मऊ मंडी संचालित हुई। हमें अपनी फसल भोजला मंडी ले जानी पड़ती है।
रामनरेश भार्गव, गढ़मऊ
मंडी बनाने के नाम पर करोड़ों खर्च किए गए हैं, लेकिन किसानों को एक पैसे का फायदा नहीं हुआ। स्थिति ज्यों की त्यों है। हमें तो अपनी फसल बेचने के लिए पहले की तरह मशक्कत करनी पड़ती है। रोहित वंशकार, बावल
ग्रामीण अवस्थापना केंद्र ( आरआईएन) आवंटियों को आवंटित हैं। इन मंडियों को चलाने में क्या दिक्कत आ रही है, इस संबंध में आवंटियों से बात की जाएगी। इन मंडियों को सुचारु रूप से चलाने के उपाय किए जाएंगे। बबलू कुमार, मंडी सचिव, झांसी
