लखनऊ। जनभवन (राजभवन) में लगी फल, शाक-भाजी और पुष्प प्रदर्शनी के दूसरे दिन शनिवार को दर्शकों की जबरदस्त भीड़ उमड़ी। यहां लगे कई स्टॉलों पर रखे उत्पादों, सब्जियों और फूलों ने उनकी विशेषता की वजह से दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया। इस दौरान भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान वाराणसी का स्टॉल इस बात के लिए आकर्षण का केंद्र बना रहा क्योंकि यहां एक ही पौधे में बैंगन और टमाटर साथ-साथ उगे हुए थे। इसे देखने और छूने के लिए लोग बेताब दिखे। इसी स्टॉल पर हरी मटर की एक किस्म ने भी लोगों को खूब लुभाया जो छिक्कल समेत खाई जाती है। इसका स्वाद भी लाजवाब था जिसे लोगों ने खूब पसंद किया।
भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान वाराणसी के स्टॉल पर मौजूद रोग विशेषज्ञ डॉ. सुदर्शन मौर्य ने बताया कि ग्राफटिंग के जरिये एक ही पौधे में बैंगन और टमाटर को साथ-साथ उगाया गया है जिसका स्वाद भी लाजवाब है। संस्थान की ओर से इसे नाम दिया गया है ब्रिमेटो। इसके अलावा काशी तृप्ति नाम की हरी मटर की खासियत है कि इसके छिक्कल समेत खाया जाता है। उन्होंने बताया कि स्कूलों में बनने वाले मिडडे मील में इसका प्रयोग आदर्श माना जा रहा है। इसमें प्रोटीन की मात्रा प्रचुर होती है जो बच्चों के विकास के लिए फायदेमंद है। इसके अलावा यहां मौजूद विशेष प्रजाति के काशी चेरी टमाटर का साइज बेर के बराबर होता है लेकिन स्वाद बेमिसाल होता है। उन्होंने बताया कि इसमें कैरोटिन अधिक मात्रा में पाया जाता है जो आंखों की रोशनी बढ़ाता है।
महोबा पान का लड्डू का स्वाद लाजवाब, चॉकलेट-टॉफियों का गजब स्वाद
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प्रदर्शनी में महोबा के पान के एक स्टॉल ने भी लोगों का ध्यान आकर्षित किया। इस स्टॉल पर महोबा का पान तो मौजूद है ही, साथ में पान से बने कई उत्पाद लोगों को खूब भा रहे हैं। पान से बने लड्डुओं का स्वाद बेहतरीन है तो वहीं पान से ही बनी चॉकलेट और टॉफियां बच्चों से लेकर बड़ों तक को भा रही हैं। महोबा से पान के इन उत्पाद को लेकर आईं मयंकिता चौरसिया ने बताया कि महोबा पान की खासियत होती है कि यह मुंह में डालते ही घुल जाता है। वहीं हम लोगों ने पान से ही लड्डू तैयार किए हैं जो स्वास्थ्य के लिए काफी फायदेमंद हैं। इसके अलावा पान, गुलाब की पत्तियों और शहद से तैयार गुलकंद भी खासा लोकप्रिय है और माउथ फ्रेशनर भी पान से तैयार किया गया है।
रेशम के छोटे से गुल्ले में 1200 मीटर तक का धागा
रेशम के छोटे से गुल्ले में 1200 मीटर तक का धागा होता है, यह सुनकर वहां मौजूद लोग सकते में आ गए और थोड़ी देर में ही यहां रंग-बिरंगे रेशम कीटों और इनसे तैयार धागों को देखने की होड़ मच गई। रेशम निदेशालय की ओर से लगे इस स्टॉल पर मौजूद डीपी सिंह ने बताया कि अलग-अलग पौधों पर अलग-अलग तरीके के कीट लार्वा को रखा जाता है। रेशम कीटपालन में रेशम कीट लार्वा के भोज्य पदार्थ के रूप में शहतूत की पत्ती की जरूरत होती है। शहतूत के पौधों से कीटपालन के लिए दो वर्ष बाद पर्याप्त पत्तियां मिलती हैं।

एक ही पौधे में बैंगन और टमाटर, छिक्कल समेत खाइए हरी मटर
