मायावती और नीतीश कुमार पर अखिलेश के बयान सिर्फ कोरी बयानबाजी तक सिमटे भर नहीं हैं। ये दलित और कुर्मी समाज की सहानुभूति हासिल करने की सपा की सोची समझी रणनीति का हिस्सा है। इतना ही नहीं इससे पहले बसपा संस्थापक कांशीराम की जयंती को बड़े पैमाने पर मनाने का फैसला भी 2027 के विधानसभा चुनाव पर केंद्रित है।

सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने शनिवार को एक बार फिर दोहराया कि इंडिया गठबंधन तो नीतीश कुमार को पीएम के पद तक ले जाना चाहता था, लेकिन भाजपा ने उन्हें कहीं का न रखा। बिना किसी तात्कालिक प्रसंग के यह भी कह डाला कि हम तो सपा-बसपा गठबंधन के तहत बसपा सुप्रीमो मायावती को भी प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे। इन बयानों के जरिये अखिलेश ने दलित समाज, खासकर जाटव जाति और पिछड़ों में कुर्मी समाज को वर्षों से दबी हसरतों को उभारने का काम किया है।

नीतीश कुमार कुर्मी समाज से हैं। अखिलेश ने नीतीश कुमार के बिहार के सीएम की कुर्सी छोड़ने का फैसला सार्वजनिक होने के बाद जदयू कार्यकर्ताओं के गुस्से को अपने एक्स अकाउंट पर स्थान दिया था। इसमें जदयू कार्यकर्ता सार्वजनिक कार्यक्रम में भोजन के लिए रखी गई प्लेटों को फेंकते हुए दिखाई दे रहे हैं। यह तथ्य भी अहम है कि यूपी में कुर्मी समाज के 11 लोकसभा सदस्य हैं, जिसमें से 7 सपा के टिकट पर जीते हैं। यहां का कुर्मी समाज भी नीतीश कुमार से जुड़ाव महसूस करता रहा है।



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