कवि सियारामशरण गुप्त की पुण्यतिथि 29 मार्च को मैंथिलीशरण पार्क में मनाई जाएगी। इस अवसर पर हिंदी साहित्य जगत उनके विचारों और कृतित्व को याद कर रहा है। ऐसे समय में जब दुनिया के कई हिस्सों में युद्ध और तनाव का माहौल बना हुआ है। उनकी काव्य रचना ‘उन्मुक्त’ का संदेश और भी अधिक प्रासंगिक हो उठता है। उस जमाने में युद्ध विरोधी विचार लिखना भी अपराध माना गया था।
1941 में प्रकाशित हुई थी काव्य रचना ‘उन्मुक्त’
आज जब इस्राइल, अमेरिका और ईरान के साथ-साथ अफगानिस्तान और पाकिस्तान बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक चिंता को बढ़ा दिया है, तब सियारामशरण गुप्त का यह विचार गूंजता हुआ प्रतीत होता है कि बढ़ते ‘दानवीबल’ का समाधान केवल अहिंसा और सह-अस्तित्व में ही निहित है। काव्य में स्पष्ट कहा गया था कि हिंसा के माध्यम से शांति स्थापित नहीं की जा सकती। ब्रितानी शासनकाल में सन् 1941 में प्रकाशित ‘उन्मुक्त’ काव्य-नाटक के रूप में रची गई ऐसी कृति है, जिसमें युद्ध के दुष्परिणामों और मानवता पर उसके प्रभाव को गहराई से चित्रित किया गया है। यह वही दौर था जब दुनिया द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका में झेल रही थी और भारत में स्वतंत्रता आंदोलन उफान पर था। ऐसे समय यह युद्ध-विरोधी स्वर अपने आप में साहसिक हस्तक्षेप था।
प्रकाशन के दिन ही मैथिलीशरण गुप्त और उनके बड़े भाई को बनाया गया था बंदी
इतिहास के पन्नों में यह भी दर्ज कि ‘उन्मुक्त’ के प्रकाशन के दिन ही उसकी भूमिका लिखने वाले मैथिलीशरण गुप्त और उनके बड़े भाई रामकिशोर गुप्त को बंदी बना लिया गया था, जो इस बात का प्रमाण है कि उस दौर में विचार भी सत्ता को चुनौती देते थे। राष्ट्रकवि के वंशज प्रमोद कुमार गुप्त बताते हैं कि उन दिनों काव्य के रचनाकार खुद बीमार थे। इसलिए उनके भाइयों को बंदी बना लिया गया था। बता दें कि झांसी के चिरगांव कस्बे में सन् 1895 में जन्मे सियारामशरण गुप्त राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के छोटे भाई थे। उन्होंने अपने काव्य में यह भी रेखांकित किया कि अहिंसा कमजोरी नहीं, बल्कि वीरता से प्रेरित एक सशक्त मार्ग है। जापान के संदर्भ में कुसुम द्वीप जैसे प्रतीकों के माध्यम से उन्होंने बताया कि सच्ची शक्ति वही है, जो संयम और नैतिकता में निहित होती है।
युद्ध की भयावहता को दिखाता है काव्य
सियारामशरण गुप्त ने अपने काव्य में आधुनिक युद्ध की भयावहता को बहुत पहले ही पहचान लिया था। वे लिखते हैं “भस्मकास्त्रों की भीषणता ने विजितों को ही ऐसा सोचने के लिए बाध्य नहीं किया है, परन्तु विजयी राष्ट्र स्वयं उससे आतंकित हो उठे हैं। अणुवाद के आविष्कार के बाद अब स्थिति उत्पन्न हो गई है कि एक-दूसरे से हिल-मिलकर ही रहना चाहिए।”
…झांसी से अमरनाथ की रिपोर्ट
