उत्तर प्रदेश में करीब एक लाख से अधिक गंभीर मरीज दान में अंग मिलने का इंतजार कर रहे हैं। इसमें किडनी, लिवर और हार्ट के 10 हजार से ज्यादा मरीज हर साल दम तोड़ देते हैं। हर साल इतने ही नए मरीज बढ़ जाते हैं। प्रत्यारोपण से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि अगर सड़क हादसे में ब्रेन डेड होने वालों के अंग दान में मिल जाएं तो काफी मरीजों की जान बचाई जा सकती है।
प्रदेश की आबादी करीब 25 करोड़ है। इस आबादी के अनुपात में किडनी के 50 से 60 हजार, लिवर के 35 से 40 हजार और हार्ट व फेफड़े के 15 से 20 हजार मरीजों को अंग प्रत्यारोपण की दरकार है। परिजनों के अंगदान करने से हर साल करीब एक हजार जरूरतमंदों में प्रत्यारोपण हो पाता है।
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विशेषज्ञों का कहना है कि लिवर और किडनी की गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीज इलाज कराते रहते हैं। किडनी वाले मरीजों की डायलिसिस चलती रहती है। अतिगंभीर 10 से 15% मरीज सालभर में दम तोड़ देते हैं। अगर कुल मरीजों की संख्या एक लाख के करीब मानी जाए तो हर साल 10 हजार से ज्यादा मरीजों की मौत हो जाती है। इनमें पंजीयन कराने और पंजीयन नहीं कराने वाले दोनों मरीज शामिल हैं।
पंजीयन व्यवस्था को पुख्ता करने की रणनीति
स्टेट ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गेनाइजेशन (सोट्टो) के निदेशक प्रो हर्षवर्धन बताते हैं कि प्रदेश के सभी चिकित्सा संस्थानों और मेडिकल कॉलेजों में लिवर, किडनी, हार्ट प्रत्यारोपण की जरूरत वाले मरीजों का पंजीयन कराया जा रहा है। अभी केवल उन मौत का रिकॉर्ड दर्ज कर पाते हैं जो सक्रिय प्रतीक्षा सूची में रहने के दौरान अस्पताल में होती हैं। इस व्यवस्था को दुरुस्त कराने की तैयारी चल रही है। हार्ट प्रत्यारोपण शुरू होने के बाद अब इसके मरीजों का भी पंजीयन होगा।
इंतजार में हैं 60 हजार मरीज
पीजीआई के नेफ्रोलॉजी विभागाध्यक्ष प्रोफेसर नारायण प्रसाद कहते हैं कि पीजीआई में सर्वाधिक किडनी प्रत्यारोपण हो रहा है। प्रदेश में करीब 50 से 60 हजार मरीजों को किडनी की जरूरत है। इनमें 10 से 15% फीसदी की मौत हो जाती है। केजीएमयू के प्रोफेसर विश्वजीत सिंह बताते हैं कि अब तक 15 मरीजों का किडनी प्रत्यारोपण किया गया है। उत्तर प्रदेश सर्वाधिक आबादी वाला राज्य होने के कारण मरीजों की संख्या भी अधिक है।
