जगनेवा गांव में बंधुआ मजदूरी के खुलासे के बाद जो कहानी सामने आई, उसने हर किसी को झकझोर कर रख दिया। जिन चार मजदूरों को पुलिस ने टिनशेड वाले कमरे से मुक्त कराया, उनकी जिंदगी किसी कैदखाने से कम नहीं थी। भूख, पिटाई, गालियां और अमानवीय यातनाएं… यही उनकी रोजमर्रा की जिंदगी बन चुकी थी।



मजदूरों ने बताया कि उनसे उनकी क्षमता से कहीं अधिक काम कराया जाता था। सुबह से देर रात तक गोबर उठवाना, पशुओं को चारा डालना, खेतों में मजदूरी कराना और घर के अन्य काम करवाए जाते थे। काम में जरा सी कमी होने पर उन्हें जानवरों की तरह पीटा जाता था। दिनभर की मजदूरी के बदले उन्हें भरपेट भोजन तक नसीब नहीं होता था। मजदूरों ने बताया कि घर में बची हुई बासी रोटियां उन्हें खाने के लिए दी जाती थीं। चार लोगों में मुश्किल से सौ ग्राम दाल बांटी जाती थी, ताकि वे केवल जिंदा रह सकें। कई बार बासी रोटी के साथ चटनी या भर्ता देकर ही उन्हें पूरा दिन गुजारना पड़ता था।



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