उत्तरी कश्मीर के सीमांत जिले कुपवाड़ा की केरन घाटी में इस बार स्वतंत्रता दिवस पर बेहद भावुक दृश्य देखने को मिला। नियंत्रण रेखा पर बसे इस गांव में 15 अगस्त की रात किशनगंगा नदी का शांत तट आतिशबाजी और आजाद हिंदुस्तान जिंदाबाद और पीओके बनेगा हिंदुस्तान के नारों से गूंज उठा।
केरन और पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) के नीलम जिले के बीच का फासला महज 30 से 40 फीट का है। बीच में केवल किशनगंगा (नीलम) नदी बहती है। भौगोलिक रूप से दोनों तरफ के मकान इतने करीब हैं कि छतों से एक-दूसरे की दैनिक गतिविधियां साफ नजर आती हैं। 1947 के बाद खिंची सरहद ने एक ही कुल-कुनबे के लोगों को दो हिस्सों में बांट दिया था।
चाचा उस पार रह गए तो भतीजा इस पार, बहन उधर ब्याही थी तो भाई इधर छूट गया। वर्षों से दोनों तरफ के लोग नदी के किनारों पर आकर केवल हाथ हिलाकर या इशारों में अपनों का हालचाल लेते रहे हैं। शादी-ब्याह से लेकर मातम तक, दोनों तरफ के रिश्तेदार सिर्फ पानी के बहाव के पार से ही आंसू बहाते हैं।
पीओके से भी उठी है भारत में शामिल होने की बात
स्वतंत्रता दिवस के इस अनोखे आयोजन के बाद केरन के लोगों ने बताया कि पहले यहां शाम ढलते ही डर का माहौल होता था। गोलीबारी होते ही बंकरों में छिपना पड़ता था। अब माहौल काफी बदल गया है। हम रात में एलओसी के किनारे खड़े होकर बेखौफ होकर आतिशबाजी कर रहे हैं। पीओके के लोग हमारे ही भाई-बहन हैं। वे वहां जुल्म सह रहे हैं। हम चाहते हैं कि यह गैर-कुदरती लकीर मिटे और वे भी हिंदुस्तान का हिस्सा बनें।
- केरन के एक युवा ने बताया कि उस पार मेरा ननिहाल है। बचपन से सिर्फ नदी किनारे खड़े होकर उन्हें हाथ हिलाते देखा है। जब हम इधर विकास, बिजली, मोबाइल नेटवर्क और अमन देखते हैं और उस पार से राशन-बिजली के लिए परेशान हाने की बात सुनते हैं, तो दिल बैठ जाता है। आज रात हमने जो नारे लगाए, वे सिर्फ जश्न नहीं बल्कि हमारे अपनों को यह पैगाम थे कि भारत उनका असली घर है। केरन में देर रात तक चली आतिशबाजी और नारों ने सरहद पार यह साफ संदेश पहुंचा दिया कि भारत के सीमांत नागरिक अब सुरक्षित और समृद्ध हैं।
