बेहतर इलाज की उम्मीद में दूर दराज से मरीज केजीएमयू पहुंचते हैं। उन्हें भरोसा होता है कि गंभीर स्थिति में तत्काल उपचार मिलेगा। हालांकि बृहस्पतिवार को केजीएमयू ट्रॉमा सेंटर की इमरजेंसी के बाहर की तस्वीर इस उम्मीद से अलग नजर आई।
अमर उजाला की पड़ताल में कई मरीज इलाज, जांच और भर्ती के लिए जद्दोजहद करते दिखे। कोई स्ट्रेचर पर या एंबुलेंस में इलाज व जांच के लिए घंटों इंतजार करता मिला तो कोई भर्ती होने के लिए जूझता नजर आया। गंभीर मरीजों को व्हीलचेयर तक के लिए भटकना पड़ा। एक मरीज को हालत गंभीर होने के बावजूद सर्जरी के लिए तीन महीने बाद नवंबर की तारीख मिली।
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कुल मिलाकर भारी-भरकम बजट और इंफ्रास्ट्रक्चर वाले केजीएमयू जैसे बड़े चिकित्सा संस्थान में मरीजों को चौखट पर ही धक्के खाने पड़ रहे हैं। यहां मरीजों और तीमारदारों को तत्काल इलाज, भर्ती और जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराने की व्यवस्था कितनी प्रभावी है, यह अमर उजाला की पड़ताल के दौरान सामने आई तस्वीरों से साफ नजर आया।
केस- 1: हालत गंभीर, सर्जरी के लिए तीन माह की तारीख
कौशांबी से आईं 70 वर्षीय बेला देवी दर्द से कराह रही थीं। उनकी पित्त की थैली में पथरी है। इससे बाइल डक्ट में सूजन और रुकावट के साथ संक्रमण लीवर तक पहुंच गया है। परिजनों के मुताबिक डॉक्टरों ने जल्द सर्जरी की जरूरत बताई थी। इसके बावजूद उन्हें नवंबर की तारीख दी गई। यानी सर्जरी के लिए करीब तीन महीने इंतजार करना था। मरीज की हालत बिगड़ती देख परिजन परेशान रहे। बाद में वे मायूस होकर दूसरी जगह इलाज कराने के लिए मरीज को लेकर चले गए।
