श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के नए स्वरूप में सिर्फ सदस्यों का विस्तार नहीं हुआ है, बल्कि इसकी संरचना में सामाजिक प्रतिनिधित्व का एक व्यापक संतुलन भी दिखाई देता है। ट्रस्ट की मूल पहचान और निर्णयों में संत समाज की केंद्रीय भूमिका बरकरार रखते हुए अब इसमें मातृशक्ति, पिछड़ा वर्ग, दलित और विधि क्षेत्र से जुड़े प्रतिनिधियों की मौजूदगी भी नजर आती है। इसे बदलते समय के साथ ट्रस्ट की भूमिका और जिम्मेदारियों के विस्तार के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।

ट्रस्ट की सबसे महत्वपूर्ण नई पहचान पहली महिला ट्रस्टी के रूप में सामने आई है। शिकोहाबाद की निर्मला यादव को जगह मिलने से पहली बार मंदिर के शीर्ष प्रबंधन में महिला भागीदारी सुनिश्चित हुई है। यह केवल महिला प्रतिनिधित्व का विषय नहीं है, बल्कि इसके साथ यादव यानी पिछड़े वर्ग की भागीदारी भी जुड़ती है। इस तरह एक ही नियुक्ति सामाजिक प्रतिनिधित्व के दो महत्वपूर्ण आयामों को सामने लाती है।

ट्रस्ट में दलित प्रतिनिधित्व पहले से मौजूद है। डॉ़ कृष्ण मोहन की मौजूदगी मंदिर आंदोलन से लेकर ट्रस्ट की संरचना तक सामाजिक समावेश के संदेश को रेखांकित करती रही है। अब महिला और पिछड़े वर्ग के प्रतिनिधित्व के साथ ट्रस्ट की सामाजिक तस्वीर और विस्तृत होती दिखाई देती है।

नई संरचना का एक और महत्वपूर्ण पहलू विधि और पेशेवर अनुभव है। वरिष्ठ अधिवक्ता के. परासरन के साथ अयोध्या के वरिष्ठ अधिवक्ता मदन मोहन पांडेय को स्थान दिया जाना बताता है कि मंदिर से जुड़े कानूनी और प्रशासनिक विषयों के लिए विशेषज्ञता को भी महत्व दिया जा रहा है। इस पूरी संरचना को देखें तो संत, महिला, पिछड़ा वर्ग, दलित, अधिवक्ता और प्रशासनिक प्रतिनिधित्व एक साथ दिखाई देता है। यानी ट्रस्ट की नई तस्वीर में सबके राम, सबके राम…की जो अवधारणा है वह साकार होती नजर आती है।



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

अभी अभी की खबरें