झांसी। महारानी लक्ष्मीबाई पैरामेडिकल कॉलेज के डॉ. दुष्यंत प्रकाश और प्रियांशु कुमार के शोध में स्कूली बच्चों में कृमि संक्रमण के खतरे को लेकर आगाह किया गया है। हाल में ‘इंटरनेशनल जर्नल ऑफ रिसर्च इन एकेडमिक वर्ल्ड’ में प्रकाशित शोध में ग्रामीण स्कूलों में राष्ट्रीय कृमि मुक्ति दिवस (एनडीडी) की पहुंच 67 फीसदी और शहरी स्कूलों में 80 फीसदी बताई गई है। खुले में शौच, हाथ न धोना और स्वच्छ पानी की कमी को संक्रमण के प्रमुख कारणों में शामिल किया गया है।
पैरामेडिकल कॉलेज के पैथोलॉजी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष डॉ. दुष्यंत प्रकाश और रिसर्च स्कॉलर प्रियांशु कुमार ने पिछले साल अप्रैल से लेकर इस साल मई तक जिले के 150 स्कूली बच्चों पर शोध किया। शोधपत्र में उत्तर प्रदेश में वर्ष 2015 में प्राथमिक विद्यालयी बच्चों पर किए गए अध्ययन का भी हवाला दिया गया है। तब अध्ययन में झांसी को अधिक संक्रमण वाले ‘रेड जोन’ में शामिल किया गया था।
डॉ. दुष्यंत प्रकाश ने दावा किया कि मध्याह्न भोजन पर फोकस करते हुए पहली बार इस तरह का शोध किया गया है। इसका उद्देश्य झांसी में बच्चों के बीच संक्रमण की स्थिति, एनडीडी की पहुंच और उससे जुड़े व्यावहारिक एवं स्वच्छता संबंधी कारकों को समझने के लिए स्थानीय आधार तैयार करना है।
मिड-डे मील की स्वच्छता भी महत्वपूर्ण
शोध में मध्याह्न भोजन की स्वच्छता को भी संक्रमण के जोखिम से जोड़ा गया है। भोजन तैयार करने में दूषित पानी का इस्तेमाल, सब्जियों को ठीक से न धोना और भोजन से पहले हाथों की सफाई नहीं होना बच्चों में संक्रमण का जोखिम बढ़ा सकता है। शोधकर्ताओं के अनुसार, मध्याह्न भोजन और एनडीडी की कवरेज को साथ देखकर विद्यालय स्तर पर निगरानी व्यवस्था को बेहतर किया जा सकता है।
बुंदेलखंड का मौसम भी बढ़ाता है चुनौती
शोध में बुंदेलखंड की भौगोलिक और जलवायु परिस्थितियों को भी संक्रमण के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना गया है। गर्मियों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से अधिक पहुंचना, मानसून में तेज बारिश और जलभराव तथा सूखे की स्थितियां पानी और स्वच्छता की उपलब्धता को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे में बच्चों को सुरक्षित पानी, शौचालय और स्वच्छता संबंधी सुविधाएं उपलब्ध कराना संक्रमण की रोकथाम के लिए महत्वपूर्ण है।
क्या है एसटीएच संक्रमण
हेल्मिंथ यानी एसटीएच ऐसे परजीवी कृमि हैं, जिनके अंडे या लार्वा संक्रमित व्यक्ति के मल से मिट्टी में पहुंचते हैं। एस्कारिस, ट्राइक्यूरिस और हुकवर्म इसके प्रमुख प्रकार हैं। बच्चों में संक्रमण से कुपोषण, आयरन की कमी से होने वाला एनीमिया, शारीरिक विकास में रुकावट और सीखने की क्षमता प्रभावित होने जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
शोध में इन बिंदुओं पर किया गया अध्ययन
शोध में 5 से 15 वर्ष के प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों के बच्चों को अध्ययन में शामिल किया गया। ग्रामीण और शहरी सरकारी विद्यालयों के बच्चों के संदर्भ में उम्र, लिंग, विद्यालय का प्रकार, एनडीडी की खुराक मिलने, मध्याह्न भोजन लेने, हाथ धोने की आदत, स्वच्छता, खुले में शौच और संक्रमण से जुड़े अन्य कारकों का अध्ययन किया गया।
डिजिटल निगरानी और नियमित जांच की सिफारिश
शोधकर्ताओं ने एनडीडी और मध्याह्न भोजन की निगरानी मजबूत करने के लिए डिजिटल व्यवस्था विकसित करने का सुझाव दिया है। बच्चों की उपस्थिति और दवा लेने की स्थिति का एसएमएस या मोबाइल एप के माध्यम से रिकॉर्ड रखने, अभिभावकों और शिक्षकों से भोजन की गुणवत्ता एवं रसोई की स्वच्छता की जानकारी लेने और प्रशिक्षित शिक्षकों के माध्यम से एनडीडी की निगरानी का सुझाव दिया गया है।
