
सरेनी क्षेत्र के दौलतपुर गांव स्थित आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का जर्जर मकान।
रायबरेली। युगदृष्टा और हिंदी साहित्य के पुरोधा आचार्य महावीर द्विवेदी ने हिंदी को उस मुकाम तक पहुंचाया जहां से आज हिंदी विदेशी भाषाओं से कमतर नहीं है। दुनिया में अंग्रेजी, लैटिन, स्पेनिश के बाद हिंदी को ही कालजयी भाषा की लोकप्रियता मिली है।
हिंदी को दुनिया में सम्मान और रुतबा दिलाने का काम रायबरेली के छोटे से गांव दौलतपुर में जन्मे आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने किया। वह 1900-1920 तक द्विवेदी युग के प्रवर्तक रहे। मुंशी प्रेमचंद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जैसी शख्सियत आचार्य को अपना अभिभावक मानती थीं।
हिंदी दिवस पर दुनिया भर में हिंदी के महत्व और उसकी अहमियत पर चर्चा के साथ उसकी ताकत का स्वागत भी होता है पर अफसोस जिस आचार्य ने मां सरीखी हिंदी की जिस घर और गांव में बैठकर सेवा की, वह वीरान है।
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का जन्म सरेनी के दौतलपुर गांव में 9 मई 1864 को हुआ था। परिवार बहुत साधारण था। धनाभाव के कारण शिक्षा का क्रम कम बढ़ा और जीआरपी में नौकरी की। 21 वर्ष की उम्र से घर छोड़कर पढ़ाई के साथ साहित्य की ओर बढ़ गए।
नौकरी के साथ आचार्य अध्ययन करते रहे और हिंदी के साथ मराठी, गुजराती और संस्कृत में भी ज्ञान अर्जित किया। 1903 में सरस्वती पत्रिका का संपादन कार्य संभाला और 1904 में जीआरपी की नौकरी छोड़कर सरस्वती के संपादन कार्य में पूरा ध्यान लगाना शुरू कर दिया। उन्होंने 81 ग्रंथों की रचना करके हिंदी को पूरी दुनिया में लोकप्रिय बना दिया।
दौतलपुर गांव में बना आचार्य का घर बस यादों का साक्षी
दौलतपुर गांव और रायबरेली की पहचान आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी से है लेकिन उनके गांव और घर को संजोने की जरूरत नहीं समझी गई। गांव में उनकी एक प्रतिमा स्थापित की गई है लेकिन घर उजाड़ सा है। कभी जिस घर में हिंदी की सेवा होती और साहित्यकारों की मंडली लगती थी, आज वह घर केवल यादों का साक्षी रह गया है।
गांव और घर घोषित हो राष्ट्रीय स्मारक, 1998 से छेड़ रखी मुहिम
1998 से आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति आचार्य के गांव को राष्ट्रीय स्मारक घोषित कराने के लिए संघर्ष कर रही है लेकिन सरकारों ने कभी भी आचार्य के गांव को पहचान दिलाने के लिए एक कदम आगे नहीं बढ़ाया। 1998 में शहर के शहीद चौक पर ध्यानाकर्षण आंदोलन किया गया था। इसके बाद लखनऊ के जीपीओ, प्रयागराज और दिल्ली के जंतर मंतर पर भी आचार्य के घर और गांव को राष्ट्रीय स्मारक घोषित किए जाने की मांग की गई थी। 1999 में तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को इसे लेकर हस्ताक्षर पत्र सौंपा गया था।
सोनिया गांधी से की भी गई मांग
वर्ष 2010 में जब तत्कालीन सांसद सोनिया गांधी दौलतपुर गांव में आचार्य के नाम पर खुले पुस्तकालय परिसर में प्रतिमा का अनावरण करने आई थीं तो उस दौरान उनसे दौलतपुर गांव और आचार्य के घर को राष्ट्रीय स्मारक घोषित कराने की मांग की गई लेकिन बाद में तत्कालीन यूपीए सरकार ने इसे राज्य सरकार का मामला बताकर उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया।
आचार्य के कपड़े, सदरी और टोपी हो रही खराब
शहर के आचार्य द्विवेदी इंटर कॉलेज के एक कमरे में आचार्य के कपड़े, सदरी और टोपी बक्से में रखी हुई है। जगह सही न होने सब खराब हो रहे हैं। इसको सहेजने को लेकर न जन प्रतिनिधि और न ही सरकारी मशीनरी ही आगे आई है। इसी कॉलेज में 1951 में आचार्य के नाम पर सांस्कृतिक केंद्र बनाया गया था। वह भवन भी जर्जर हो गया है।
