लखनऊ। कभी नवाबों और रईसों की महफिलों की पहचान रहे मुशायरे आज स्कूलों, विश्वविद्यालयों और सोशल मीडिया तक पहुंच चुके हैं। इस बदलाव के बीच मुशायरे की साहित्यिक परंपरा, उर्दू के प्रचार-प्रसार और हिंदी-उर्दू की साझा सांस्कृतिक विरासत को समझने की कोशिश की है लखनऊ विश्वविद्यालय के शोधार्थी मोहम्मद शहज़ाद ने। उन्होंने दुबई में होने वाले ‘जश्न-ए-जम्हूरिया-ए-हिंद: मुशायरा व कवि सम्मेलन’ की 24 साल की यात्रा को अपने शोध का विषय बनाया है। शोध में उन्होंने यह भी बताया है कि मुशायरों के जरिये उर्दू जुबान को ऑक्सीजन मिल रही है।

लखनऊ विवि के उर्दू विभाग के अध्यक्ष प्रो. अब्बास रज़ा नैयर के निर्देशन में पूरा हुआ यह शोध प्रवासी भारतीय समाज में साहित्यिक आयोजनों की भूमिका और भाषाई-सांस्कृतिक जुड़ाव को समझने का अवसर देता है। शोध को हिंदी और उर्दू, दोनों भाषाओं में पुस्तक के रूप में प्रकाशित करने की भी योजना है। वर्ष 2027 में प्रस्तावित आयोजन की रजत जयंती के अवसर पर पुस्तक का विमोचन किए जाने की भी योजना है।

मो. शहजाद ने बताया कि दुबई के इंडियन हाई स्कूल स्थित शेख राशिद ऑडिटोरियम में 23 जनवरी 2003 को इस आयोजन की शुरुआत हुई थी। संस्थापक सैयद सलाहुद्दीन की पहल पर शुरू हुआ यह कार्यक्रम गणतंत्र दिवस के अवसर पर हिंदी के कवियों और उर्दू के शायरों को साझा मंच प्रदान करता है। वर्ष 2026 में यह अपने 24वें आयोजन तक पहुंच रहा है। शोध में बताया गया कि इस साहित्यिक कार्यक्रम की यात्रा उर्दू भाषा के प्रचार-प्रसार के साथ प्रवासी भारतीयों की सांस्कृतिक पहचान से भी जुड़ती है। हिंदी और उर्दू के रचनाकारों की संयुक्त भागीदारी भाषाई विविधता और साझा साहित्यिक परंपरा को सामने लाती है।

लोकप्रियता के साथ साहित्यिक गुणवत्ता भी जरूरी

शोध में यह भी निष्कर्ष निकाला गया है कि मुशायरे की बदलती दुनिया में एक बड़ा सवाल उसकी लोकप्रियता और साहित्यिक गुणवत्ता के संतुलन का भी है। मंचों पर श्रोताओं की भीड़, तालियां और सोशल मीडिया पर वायरल होती शायरी किसी रचना के प्रभाव का संकेत तो हो सकते हैं, लेकिन इन्हें साहित्यिक श्रेष्ठता का एकमात्र पैमाना नहीं माना जा सकता। मुशायरे की असली ताकत तभी सामने आती है, जब वह मनोरंजन के साथ विचार, सामाजिक संवेदना और साहित्यिक समझ भी विकसित करे। इसी तरह उर्दू के प्रचार-प्रसार का उद्देश्य केवल शेर सुनने और याद करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए।

नई पीढ़ी को साहित्य से जोड़ने की चुनौती

मो. शहजाद के शोध मेंं सामने आया कि डिजिटल माध्यमों ने मुशायरों की पहुंच बढ़ाई है, लेकिन रचनाओं के छोटे-छोटे अंशों के वायरल होने से उनके व्यापक संदर्भ पीछे छूटने का खतरा भी है। ऐसे में साहित्यिक आयोजनों के सामने चुनौती है कि वे नई पीढ़ी को केवल श्रोता नहीं, बल्कि पाठक और रचनाकार बनाने की दिशा में भी काम करें।



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