{“_id”:”6ae653cd071c77cc5e0f01a6″,”slug”:”electric-potters-wheel-sparks-a-boost-in-the-earthen-lamp-business-jhansi-news-c-11-jhs1004-908778-2026-11-01″,”type”:”story”,”status”:”publish”,”title_hn”:”Jhansi News: इलेक्ट्रिक चाक से चकमक हुआ दीये का कारोबार”,”category”:{“title”:”City & states”,”title_hn”:”शहर और राज्य”,”slug”:”city-and-states”}}

दीपावली के लिए इलेक्ट्रिक चाक पर मिट्टी के दीए बनाता कुंभकार। संवाद
झांसी। दिवाली पर घरों को रोशन करने वाले मिट्टी के दीयों के पीछे कुम्हार परिवारों की महीनों की मेहनत होती है। सीपरी बाजार निवासी रामसेवक प्रजापति का परिवार 50 वर्षों से इस पारंपरिक कारोबार को आगे बढ़ा रहा है। दिवाली के लिए दीये और देवी-देवताओं की मूर्तियां बनाने की तैयारी वे छह महीने पहले से शुरू कर देते हैं।
रामसेवक ने बताया कि मिट्टी तैयार करने से लेकर दीये और मूर्तियां बनाने तक का पूरा काम परिवार खुद करता है। इसमें उन्हें सुखाना, रंगना और थोक बाजार में बेचना भी शामिल है। पहले हाथ से चलने वाले पत्थर के चाक पर दीये बनाने में बहुत मेहनत लगती थी। अब इलेक्ट्रिक चाक से यह काम कुछ आसान हो गया है। बृजेंद्र प्रजापति के अनुसार, पत्थर के चाक से एक दिन में करीब एक हजार दीये बनते थे। इलेक्ट्रिक चाक से अब दो हजार से अधिक दीये प्रतिदिन तैयार हो रहे हैं। इससे उत्पादन में वृद्धि हुई है और मेहनत भी कम हुई है। त्योहार के मौसम में परिवार का पूरा घर एक छोटी कार्यशाला में बदल जाता है।
परिवार का सहयोग
रामसेवक के बेटे अमित प्रजापति और बृजेंद्र प्रजापति पढ़ाई के साथ पिता का हाथ बंटाते हैं। वे दीये बनाने के साथ देवी-देवताओं की मूर्तियां भी तैयार करते हैं। परिवार खुद ही अपने तैयार उत्पादों की थोक बिक्री करता है। दिवाली का सीजन खत्म होने के बाद रामसेवक परिवार के भरण-पोषण के लिए मजदूरी करते हैं।
दीयों की कीमत में बदलाव
अमित ने बताया कि करीब 20 साल पहले एक हजार दीये 200 रुपये में मिलते थे। वहीं, वर्ष 2026 में 200 दीये 650 रुपये में बिक रहे हैं। त्योहार के मौसम में दीयों की मांग बढ़ने के साथ परिवार की मेहनत भी बढ़ जाती है। मिट्टी के दीयों को आकार देने से लेकर बाजार तक पहुंचाने का यह सफर परिवार की लगन दर्शाता है।
