झांसी। बुंदेलखंड की पहचान अब सूखे और पानी की किल्लत से नहीं, बल्कि जल संरक्षण के प्रयासों से होनी चाहिए। इसके लिए परंपरागत जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने के साथ नए जल क्षेत्र विकसित करने होंगे। पेड़ लगाने के साथ पानी सहेजने की मुहिम भी चलानी होगी। यह कहना है देश के प्रख्यात पर्यावरणविद्, समाजसेवी और पद्मभूषण से सम्मानित डॉ. अनिल प्रकाश जोशी का। वह प्रकृतिपथ साइकिल यात्रा लेकर झांसी पहुंचे। यहां अमर उजाला से खास बातचीत में उन्होंने बुंदेलखंड के जल संकट और पर्यावरण संरक्षण पर अपनी बात रखी।

डॉ. जोशी ने कहा कि प्रकृति को बचाने के लिए हमें अपनी परंपराओं की ओर लौटना होगा। तालाबों, जंगलों और प्राकृतिक जल स्रोतों को विकास की प्राथमिकता में शामिल करना होगा। बारिश का पानी व्यर्थ बह जाता है, जबकि इसे सहेजकर बड़े जल संकट से बचा जा सकता है। प्रकृति ने हमें तालाब, नदियां और हिमखंड जैसे जल स्रोत दिए हैं। जरूरत है कि पुराने जल स्रोतों को पुनर्जीवित किया जाए और नए जल क्षेत्र विकसित किए जाएं। जलागम क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता बढ़ेगी तो पेड़-पौधे और वन्यजीव भी स्वत: पनपने लगेंगे। ऐसे प्रयासों के सकारात्मक परिणाम पहले भी सामने आए हैं।

उन्होंने कहा कि बुंदेलखंड में पानी के क्षेत्र में काम हुआ है और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी जल स्रोतों के संरक्षण पर काम कर रहे हैं लेकिन क्षेत्र को सूखे की पहचान से बाहर निकालने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। इसके लिए सरकार के साथ समाज को भी जिम्मेदारी निभानी होगी।

डॉ. जोशी ने कहा कि प्रकृति, पारिस्थितिकी और आर्थिकी का एक साथ चलना जरूरी है, लेकिन मौजूदा विकास व्यवस्था में इनके बीच तालमेल नहीं दिखता। बदलते मौसम का असर खेती पर पड़ रहा है। मौसम में बदलाव और बढ़ती उमस भी पर्यावरणीय असंतुलन के संकेत हैं। गांधी जी के गांव केंद्रित विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि गांवों को आत्मनिर्भर बनाने और स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर ध्यान देना होगा। उनकी यह यात्रा दो अक्तूबर को गांधी जयंती के अवसर पर नेपाल के जनकपुर धाम से शुरू हुई थी।

उन्होंने चेताया कि पर्यावरण की स्थिति बिगड़ चुकी है और अब इसे बचाने के लिए केवल बातें करने से काम नहीं चलेगा। जमीनी स्तर पर प्रयास करने होंगे। शहरों में प्रदूषण और पानी का संकट बढ़ा तो लोगों को गांवों की ओर लौटना पड़ेगा। कोविड के दौरान भी ऐसा देखने को मिला था। पानी और हवा जैसे बुनियादी संसाधनों की कमी होने पर गांव और अपना घर ही सुरक्षित ठिकाना बनेंगे।

डॉ. जोशी ने कहा कि अब प्रकृति संरक्षण के अलावा कोई विकल्प नहीं है। बुंदेलखंड में तालाबों, नदियों और पारंपरिक जल संरचनाओं को बचाकर जल संकट की तस्वीर बदली जा सकती है। क्षेत्र की पहचान सूखे से बदलकर पानी और हरियाली की हो, इसके लिए सामूहिक प्रयास जरूरी हैं। (ब्यूरो)



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *