बरुआसागर। आधुनिकता के इस दौर में भले ही दिवाली का पर्व झिलमिलाती बिजली की झालरों की रोशनी से सराबोर रहता हो, लेकिन आज भी परंपरा की नींव यानी मिट्टी के दीयों का बाजार अपनी जगह मजबूती से बनाए हुए है। दिवाली नजदीक आते ही बरुआसागर के कुम्हार और मिट्टी के कारीगर दिन-रात चाक चलाकर दीये तैयार करने में जुटे हैं। इन कारीगरों के लिए दिवाली केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि सालभर की मेहनत को मुकाम देने और आजीविका कमाने का सबसे बड़ा जरिया है।

बरुआसागर बस स्टैंड निवासी धर्मेंद्र प्रजापति बताते हैं कि उनके परिवार में मिट्टी के दीपक और बर्तन बनाने का कार्य पीढ़ियों से चला आ रहा है। उनके लिए मिट्टी को आकार देना सिर्फ एक रोजगार नहीं, बल्कि पैतृक विरासत है। हालांकि, वक्त के साथ इस व्यवसाय का स्वरूप बदला है। पहले जहां पूरा परिवार मिलकर इस काम में हाथ बंटाता था, वहीं अब नई पीढ़ी के युवा बेहतर भविष्य की तलाश में दूसरी नौकरियों और व्यवसायों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे इस पुश्तैनी कला की ओर रुझान कम हुआ है।

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भाई शिक्षक, फिर भी पैतृक काम से लगाव

परंपरा और जिम्मेदारी का एक अनूठा उदाहरण धर्मेंद्र प्रजापति का परिवार पेश करता है। धर्मेंद्र के भाई अशोक प्रजापति पेशे से शिक्षक हैं, इसके बावजूद वह समय निकालकर अपने इस पैतृक काम में भाई का पूरा हाथ बंटाते हैं। धर्मेंद्र और अशोक के अलावा बस स्टैंड क्षेत्र के ही भगवत दयाल प्रजापति, शंकर, भानु और प्रदीप प्रजापति जैसे कई कारीगर लगातार कड़ी मेहनत कर इस पारंपरिक व्यवसाय की लौ को जलाए हुए हैं।

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चार महीने पहले शुरू हो जाता है काम

दिवाली के इस विशेष सीजन के लिए ये कारीगर करीब चार महीने पहले से ही तैयारियां शुरू कर देते हैं। इन दीयों की मांग न केवल स्थानीय स्तर पर है, बल्कि आसपास के क्षेत्रों जैसे झांसी, शिवपुरी, दिनारा, करेरा, मऊरानीपुर, मोंठ, निवाड़ी और पृथ्वीपुर से आने वाले व्यापारी यहां से थोक में दीये खरीदकर ले जाते हैं।

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बाजार तक का कठिन है सफर

मिट्टी तैयार करने से लेकर चाक पर दीया उकेरने, उन्हें सुखाने और फिर भट्टी में पकाने तक की प्रक्रिया बेहद श्रमसाध्य है। बदलते वक्त के साथ इन कारीगरों ने भी खुद को ढाला है। अब पारंपरिक दीयों के साथ-साथ बाजार की मांग के अनुरूप छोटे-बड़े और कई तरह के रंग-बिरंगे, डिजाइनर व सजावटी दीये भी तैयार किए जा रहे हैं। हालांकि, कारीगरों के सामने बढ़ती लागत एक बड़ी चुनौती बनकर खड़ी है। कारीगरों का कहना है कि मिट्टी, ईंधन, रंग और ट्रांसपोर्ट के दाम लगातार बढ़ रहे हैं। मेहनत और लागत के अनुपात में बाजार से मिलने वाला मुनाफा बेहद कम रह जाता है।

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ग्वालिन भी हो रहीं हैं तैयार

बरुआसागर। दिवाली पर्व नजदीक आते ही बुंदेलखंड की अनूठी परंपरा मिट्टी की ग्वालिन बनाने का काम जोर पकड़ गया है। कारीगर दिन-रात प्रतिमाएं तैयार करने में जुटे हैं। बुंदेलखंड में दिवाली पर मां लक्ष्मी पूजन के साथ ग्वालिन पूजन की विशेष परंपरा है। मान्यता है कि लक्ष्मी पूजन के बाद सुख-समृद्धि के लिए ग्वालिन पूजी जाती है। कारीगर चिकनी मिट्टी से ग्वालिन का आकार देते हैं, सुखाते हैं और फिर रंगों से आकर्षक बनाते हैं। इसके साथ मिट्टी के छोटे बर्तन भी तैयार हो रहे हैं। कटरा मुहल्ला निवासी कारीगर रामप्रसाद प्रजापति 40 वर्षों से यह कार्य कर रहे हैं। वे दिवाली से चार-पांच माह पूर्व ही ग्वालिन बनाना शुरू कर देते हैं। महंगाई के कारण लागत बढ़ी है, जिससे उनका लाभ कम हुआ है। संवाद



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